(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

18.1. अध्यायः 001


स्वर्गारोहणपर्व - अध्याय 004
॥ श्रीः ॥
18.4. अध्यायः 004
Mahabharata - SwargarohaNa Parva - Chapter Topics
युधिष्ठिरेण स्वर्गे निवसतां कृष्णकर्णादीनां दर्शनम्॥ 1 ॥ इन्द्रेण युधिष्ठिराय द्रौपदेयादीनां तत्तत्स्थानगतानां पृथक्पृथक्प्रदरशनम्॥ 2 ॥
Mahabharata - SwargarohaNa Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच

ततो युधिष्ठिरो राजा देवैः सर्षिमरुद्गणैः।
स्तूयमानो ययौ तत्र यत्र ते कुरुपुङ्गवाः॥ 18-4-1(98553)
ददर्श तत्र गोविन्दं ब्राह्मेण वपुषाऽन्वितम्।
तेनैव दृष्टपूर्वेण सादृश्येनैव सूचितम्॥ 18-4-2(98554)
दीप्यमानं स्ववपुषा दिव्यैरस्त्रैरुपस्थितम्।
चक्रप्रभृतिभिर्घोरैर्दिव्यैः पुरुषविग्रहैः॥ 18-4-3(98555)
उपास्यमानं वीरेण फल्गुनेन सुवर्चसा।
तथास्वरूपं कौन्तेयो ददर्श मधुसूदनम्॥ 18-4-4(98556)
तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ समुद्वीक्ष्य युधिष्ठिरम्।
यथावत्प्रतिपेदाते पूजया देवपूजितौ॥ 18-4-5(98557)
अपरस्मिन्नथोद्देशे कर्णं शस्त्रभृतां वरम्।
द्वादशादित्यसहितं ददर्श कुरुनन्दनः॥ 18-4-6(98558)
अथापरस्मिन्नुद्देशे मरुद्गणवृतं विभुम्।
भीमसेनमथापश्यत्तेनैव वपुषाऽन्वितम्॥ 18-4-7(98559)
वायोर्मूर्तिमतः पार्श्वे दिव्यमूर्तिसमन्वितम्।
श्रिया परमया युक्तं सिद्धिं परमिकां गतम्॥ 18-4-8(98560)
अश्विनोस्तु तथा स्थाने दीप्यमानौ स्वतेजसा।
नकुलं सहदेवं च ददर्श कुरुनन्दनः॥ 18-4-9(98561)
तथा ददर्श पाञ्चालीं कमलोत्पलमालिनीम्।
वपुषा स्वर्गमाक्रम्य तिष्ठन्तीमर्कवर्चसम्॥ 18-4-10(98562)
तत्रैनां सहसा राजा स्प्रष्टुमैच्छद्युधिष्ठिरः।
ततोऽस्य भगवानिन्द्रः कथयामास देवराट्॥ 18-4-11(98563)
श्रीरेषा द्रौपदीरूपा त्वदर्थे मानुषं गता।
अयोनिजा लोककान्ता पुण्यगन्धा युधिष्ठिर॥ 18-4-12(98564)
रत्यर्थं भवतां ह्येषा निर्मिता शूलपाणिना।
द्रुपदस्य कुले जाता भवद्भिश्चोपजीविता॥ 18-4-13(98565)
एते पञ्च महाभागा गन्धर्वाः पावकप्रभाः।
द्रौपद्यास्तनया राजन्युष्माकममितौजसः॥ 18-4-14(98566)
पश्य गन्धर्वराजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम्।
एनं च त्वं विजानीहि भ्रातरं पूर्वजं पितुः॥ 18-4-15(98567)
अयं ते पूर्वजो भ्राता कौन्तेयः पावकद्युतिः।
सूर्यपुत्रो रथिश्रेष्ठो राधेय इति विश्रुतः।
आदित्यसहितो भाति पश्यैनं पुरुषर्षभम्॥ 18-4-16(98568)
साध्यानामथ देवानां विश्वेषां मरुतामपि।
गणेषु पश्य राजेन्द्र वृष्णन्धकमहारथान्।
सात्यकिप्रमुखान्वीरान्भोजांश्चैव महाबलान्॥ 18-4-17(98569)
सोमेन सहितं पश्य सौभद्रमपराजितम्।
अभिमन्युं महेष्वासं निशाकरसमद्युतिम्॥ 18-4-18(98570)
एष पाण्डुर्महेष्वासः कुन्त्या माद्र्या च सङ्गतः।
विमानेन सदाऽभ्येति पिता तव ममान्तिकम्॥ 18-4-19(98571)
वसुभिः सहितं पश्य भीष्मं शान्तनवं नृपम्।
द्रोणं बृहस्पतेः पार्श्वे गुरुमेनं निशामय॥ 18-4-20(98572)
एते चान्ये महीपाला योधास्तव च पाण्डव।
गन्धर्वसहिता यान्ति यक्षपुण्यजनैस्तथा॥ 18-4-21(98573)
गुह्यकानां गतिं चापि केचित्प्राप्ता नराधिपाः।
त्यक्त्वा देहं जितः स्वर्गः पुण्यवाग्बुद्धिकर्मभिः॥ ॥ 18-4-22(98574)

इति श्रीमन्महाभारते स्वार्गारोहणपर्वणि चतुर्थोऽध्यायः॥ 4 ॥

Mahabharata - SwargarohaNa Parva - Chapter Footnotes
7-4-2 ब्राह्मेण ब्रह्मणा आराध्येन॥ 7-4-3 उपस्थितं सेवितं अस्त्रैः॥ 7-4-12 मानुषं मानुषभावम्॥


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